
अंतरराष्ट्रीय स्थिति में मध्य पूर्व संकट एक नई और भी खतरनाक दिशा में पहुंच गया है, क्योंकि संयुक्त राज्य अमेरिका और इज़राइल की सेनाओं ने रात भर किए गए हवाई हमलों में ईरान की राजधानी तेहरान के प्रमुख सरकारी ठिकानों को निशाना बनाया, जिसमें देश के राष्ट्रपति कार्यालय और सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल (सुरक्षा परिषद) की बिल्डिंग पर सीधे हमले शामिल हैं। इस हमले की जानकारी इज़रायली रक्षा बल (IDF) ने अपने बयान में दी, जिसमें उन्होंने बताया कि इन निशानों को ‘आइडेंटिफाइड हाई-प्रायोरिटी’ के रूप में लक्ष्य बनाकर हवाई हमलों के जरिए हटाया गया।
IDF के बयान के अनुसार, तेहरान के दिल में स्थित इन प्रमुख सरकारी इमारतों पर सटीक रूप से मिसाइलें गिराई गईं, जिनका उद्देश्य ईरान के शासन और सैन्य निर्णय प्रणाली को बाधित करना बताया गया है। बयान में यह भी कहा गया कि हमले में प्रशिक्षण केंद्र और अन्य रणनीतिक ढांचे भी शामिल थे, जिनके बारे में इज़रायल का दावा है कि वे “आतंकी गतिविधियों के मूल स्रोत” थे।
यह हमला ऐसे समय हुआ है जब अमेरिका और इज़राइल के बीच ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ के तहत ईरान पर बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान जारी है, जिसमें दोनों देशों ने संयुक्त रूप से देश के कई हजार लक्ष्यों पर हमलों का दावा किया है। पेंटागन ने इस अभियान को “इतिहास में सबसे घातक और जटिल हवाई मिशन” बताया था, जिसमें इरानी सैन्य ढांचे के कई हिस्सों को निशाना बनाया गया।
इस हमले के बाद से संघर्ष और भी व्यापक रूप ले रहा है। ईरान ने अमेरिकी और इज़रायली हमलों पर जवाबी कार्रवाई करते हुए मध्य पूर्व के कई क्षेत्रों और अमेरिकी मित्र देशों के ठिकानों को मिसाइलों और ड्रोन से निशाना बनाया है। खासकर कुवैत और सऊदी अरब में अमेरिकी दूतावास परिसरों पर मिसाइल हमलों की खबरें आई हैं, जिससे अमेरिका-इज़राइल संघर्ष और क्षेत्रीय स्तर पर फैल गया है।
इन घटनाओं के बीच, अमेरिका के रक्षा मंत्री ने स्पष्ट किया है कि उनका उद्देश्य ईरान में दीर्घकालिक युद्ध नहीं करना है और न ही किसी तरह का सत्ता परिवर्तन लाना है; बल्कि यह कार्रवाई केवल सुरक्षा कारणों से और अपने सैनिकों व क्षेत्रीय स्थिरता के लिए की जा रही है।
इस व्यापक संघर्ष में अब तक ईरान में सैकड़ों लोग मारे गए हैं और कई शहरों को भारी नुकसान पहुंचा है। दोनों पक्षों के हमलों और जवाबी हमलों के कारण मध्य पूर्व की स्थिति बेहद अस्थिर और तनावपूर्ण बनी हुई है, जिसका वैश्विक राजनीति और ऊर्जा बाजारों पर भी गहरा प्रभाव पड़ रहा है।



