
बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने मौजूदा प्रधानमंत्री तारिक रहमान के भारत में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन में शामिल नहीं होने के फैसले पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि अगर उनकी दिल्ली में मौजूदगी तारिक रहमान के भारत आने में बाधा मानी जा रही है, तो यह समझना मुश्किल है कि उनके पिता जियाउर रहमान के भारत दौरे के समय ऐसी समस्या क्यों नहीं हुई थी। हसीना ने इस फैसले को बांग्लादेश के राष्ट्रीय हितों के लिहाज से दुर्भाग्यपूर्ण बताया।
एक साक्षात्कार में हसीना ने करीब पांच दशक पुरानी घटना का जिक्र किया। उन्होंने याद दिलाया कि 1979 में जियाउर रहमान भारत आए थे, उस समय वह खुद दिल्ली में रह रही थीं। अगस्त 1975 में अपने पिता शेख मुजीबुर रहमान और परिवार के कई सदस्यों की हत्या के बाद हसीना भारत में निर्वासन का जीवन बिता रही थीं। उनके मुताबिक, उनकी मौजूदगी ने उस समय जियाउर रहमान के भारत आने में रुकावट नहीं डाली थी। इसी आधार पर उन्होंने तारिक रहमान के फैसले पर सवाल उठाया।
हसीना का कहना है कि विदेश नीति को व्यक्तिगत राजनीतिक मतभेदों या किसी एक व्यक्ति को लेकर असहजता के आधार पर तय नहीं किया जाना चाहिए। उनके मुताबिक, ब्रिक्स जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर भाग लेने से बांग्लादेश को आर्थिक सहयोग, निवेश और अंतरराष्ट्रीय संपर्क बढ़ाने के अवसर मिल सकते थे। उन्होंने आरोप लगाया कि सम्मेलन से दूरी बनाकर बांग्लादेश ने अपने लिए उपलब्ध एक महत्वपूर्ण अवसर गंवा दिया। ये टिप्पणियां हसीना का पक्ष हैं; बांग्लादेश सरकार ने सम्मेलन में शामिल न होने के फैसले के पीछे अलग वजह बताई थी।
विवाद की शुरुआत सितंबर में नई दिल्ली में हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान हुई थी। भारत की ओर से तारिक रहमान को सम्मेलन के आउटरीच सत्र में शामिल होने का निमंत्रण दिया गया था। भारतीय पक्ष के अनुसार, उन्हें बिम्सटेक के अध्यक्ष के रूप में आमंत्रित किया गया था। बांग्लादेश सरकार ने इस बात पर जोर दिया कि निमंत्रण देश के प्रधानमंत्री के रूप में नहीं, बल्कि क्षेत्रीय संगठन के अध्यक्ष के तौर पर दिया गया था। इसी अंतर को आधार बनाकर ढाका ने सम्मेलन में भाग नहीं लेने का फैसला किया।
बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय के राज्य मंत्री हुमायूं कबीर ने भी निमंत्रण की प्रकृति पर सवाल उठाए थे। उनका कहना था कि प्रधानमंत्री के रूप में तारिक रहमान को आमंत्रित नहीं किया गया था और उनकी पहली भारत यात्रा द्विपक्षीय दौरे के रूप में होनी चाहिए। दूसरी ओर, भारत का कहना था कि तारिक रहमान को ब्रिक्स के आउटरीच सत्र के लिए आमंत्रित किया गया था और अलग द्विपक्षीय यात्रा की संभावना भी खुली थी। अंततः बांग्लादेश की ओर से सम्मेलन में कोई सरकारी प्रतिनिधिमंडल शामिल नहीं हुआ।
भारत-बांग्लादेश संबंधों में तनाव का एक अहम मुद्दा हसीना का भारत में रहना भी है। अगस्त 2024 में बांग्लादेश में उनकी सरकार गिरने के बाद वह भारत आ गई थीं। बांग्लादेश की मौजूदा सरकार उनकी वापसी और प्रत्यर्पण की मांग करती रही है, जबकि हसीना अपने खिलाफ चल रही कार्रवाई को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताती रही हैं। इस मुद्दे ने दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंधों को प्रभावित किया है, हालांकि ब्रिक्स सम्मेलन में बांग्लादेश की गैरमौजूदगी का एकमात्र कारण यही था, इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
तनाव की चर्चा उस समय और बढ़ गई जब 13 अक्टूबर को नई दिल्ली में आयोजित बिम्सटेक की पहली गृह मंत्री-स्तरीय बैठक में बांग्लादेश के गृह मंत्री सलाहुद्दीन अहमद शामिल नहीं हुए। उनकी जगह बांग्लादेश के गृह मंत्रालय के वरिष्ठ सचिव मंजूर मोर्शेद चौधरी के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल ने भाग लिया। लगातार दो महत्वपूर्ण क्षेत्रीय बैठकों में बांग्लादेश के शीर्ष नेताओं की अनुपस्थिति ने भारत और बांग्लादेश के रिश्तों की मौजूदा स्थिति पर सवाल खड़े किए हैं।
हसीना ने अपने बयान के जरिए तारिक रहमान सरकार की भारत नीति पर सवाल उठाए हैं और कहा है कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग के अवसरों को राजनीतिक मतभेदों से अलग रखकर देखना चाहिए। दूसरी ओर, बांग्लादेश सरकार ने ब्रिक्स सम्मेलन के निमंत्रण को लेकर अपनी आपत्ति स्पष्ट की है। ऐसे में दोनों देशों के रिश्तों में आगे सुधार किस तरह होगा, यह कूटनीतिक बातचीत, आपसी भरोसे और हसीना के भारत में रहने जैसे संवेदनशील मुद्दों पर होने वाली प्रगति पर निर्भर करेगा।



