
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल आपूर्ति मार्गों में से एक Strait of Hormuz को लेकर कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है। इसी क्रम में फ्रांस के राष्ट्रपति Emmanuel Macron ने भारत के प्रधानमंत्री Narendra Modi से फोन पर बातचीत की, जिसमें दोनों नेताओं ने इस अहम जलमार्ग को “तुरंत खोलने” और यहां सुरक्षित आवाजाही बहाल करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
बातचीत के दौरान दोनों नेताओं ने पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष की स्थिति की समीक्षा की और इस बात पर सहमति जताई कि होर्मुज जलडमरूमध्य में सुरक्षा और नेविगेशन की स्वतंत्रता (freedom of navigation) को जल्द से जल्द बहाल किया जाना बेहद जरूरी है। प्रधानमंत्री मोदी ने भी कहा कि भारत और फ्रांस इस दिशा में मिलकर काम करेंगे ताकि क्षेत्र में शांति और स्थिरता सुनिश्चित की जा सके।
दरअसल, हाल के हफ्तों में अमेरिका-ईरान टकराव और सैन्य गतिविधियों के बाद इस जलमार्ग पर असर पड़ा है, जिससे वैश्विक तेल सप्लाई और व्यापार पर गंभीर प्रभाव पड़ा है। विशेषज्ञों के मुताबिक, दुनिया के कुल तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है, ऐसे में इसका बंद होना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।
इसी पृष्ठभूमि में फ्रांस और ब्रिटेन की अगुवाई में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बैठकें भी आयोजित की जा रही हैं, जिनका उद्देश्य इस जलमार्ग को फिर से खोलना और समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करना है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कई देशों के साथ मिलकर एक “डिफेंसिव मिशन” तैयार किया जा रहा है, जिससे जहाजों की सुरक्षित आवाजाही बहाल की जा सके।
हालांकि, स्थिति अभी भी पूरी तरह सामान्य नहीं हुई है। कुछ रिपोर्ट्स में संकेत मिले हैं कि युद्धविराम के दौरान सीमित रूप से रास्ता खोला गया है, लेकिन स्थायी समाधान के लिए अंतरराष्ट्रीय सहमति और कूटनीतिक प्रयास जरूरी हैं।
भारत के लिए यह मुद्दा खास तौर पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से आयात करता है। ऐसे में होर्मुज में किसी भी तरह की बाधा सीधे तौर पर भारत की ऊर्जा सुरक्षा और अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकती है।
कुल मिलाकर, मैक्रों और पीएम मोदी के बीच हुई यह बातचीत इस बात का संकेत है कि अब होर्मुज जलडमरूमध्य का मुद्दा केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक चिंता का विषय बन चुका है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस संकट का समाधान कैसे निकालता है और क्या यह महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पूरी तरह से सामान्य हो पाता है या नहीं।



