
बिहार की राजनीति में बड़ा दिन देखने को मिला, जब मुख्यमंत्री Samrat Choudhary ने विधानसभा में अपनी सरकार का बहुमत साबित करने के लिए विश्वास मत पेश किया। 15 अप्रैल 2026 को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद यह उनका पहला और सबसे अहम शक्ति परीक्षण था, जिस पर पूरे राज्य की नजरें टिकी हुई थीं। विधानसभा के विशेष सत्र में जैसे ही कार्यवाही शुरू हुई, सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिली।
एनडीए सरकार पहले से ही मजबूत स्थिति में नजर आ रही थी, क्योंकि उसके पास बीजेपी, जेडीयू, लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास), हम और अन्य सहयोगी दलों के कुल 201 विधायकों का समर्थन है, जो 243 सदस्यीय विधानसभा में दो-तिहाई बहुमत से भी अधिक है। ऐसे में यह फ्लोर टेस्ट महज एक औपचारिकता माना जा रहा था, लेकिन राजनीतिक बयानबाजी ने इसे बेहद दिलचस्प बना दिया।
सदन में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने अपने संबोधन में विकास को अपनी प्राथमिकता बताते हुए कहा कि उनकी सरकार का मुख्य उद्देश्य बिहार को आगे बढ़ाना है। उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री Nitish Kumar के कार्यकाल की सराहना की और कहा कि उनकी सोच और मार्गदर्शन से ही नई सरकार आगे बढ़ेगी। साथ ही उन्होंने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि सत्ता किसी की “बपौती” नहीं होती और जनता का विश्वास ही सरकार की असली ताकत है।
वहीं, नेता प्रतिपक्ष Tejashwi Yadav ने सरकार पर जोरदार हमला बोला। उन्होंने बिहार की आर्थिक स्थिति, बेरोजगारी और गरीबी जैसे मुद्दों को उठाते हुए कहा कि राज्य अब भी देश के सबसे गरीब राज्यों में शामिल है। तेजस्वी ने यह भी आरोप लगाया कि राजनीतिक घटनाक्रम के जरिए जनादेश के साथ खेल किया गया है। हालांकि, अंत में उन्होंने सरकार को शुभकामनाएं देते हुए संवाद की आवश्यकता पर जोर दिया।
फ्लोर टेस्ट के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर लगातार जारी रहा। कुछ विपक्षी दलों ने इस पूरी प्रक्रिया को “जनता के विश्वास के साथ विश्वासघात” बताया, जबकि सत्तापक्ष ने इसे लोकतांत्रिक परंपरा का जरूरी हिस्सा बताया। इस बीच, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इतनी बड़ी संख्या में विधायकों का समर्थन मिलने के कारण सम्राट चौधरी सरकार की स्थिति फिलहाल बेहद मजबूत है।
गौरतलब है कि यह बदलाव तब हुआ जब Nitish Kumar ने पद छोड़ दिया और बीजेपी के नेतृत्व में नई सरकार बनी। इसे बिहार की राजनीति में एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। फ्लोर टेस्ट के साथ ही यह साफ हो गया कि नई सरकार को सदन का पूरा समर्थन हासिल है और अब वह अपने एजेंडे पर काम करने के लिए पूरी तरह तैयार है।
कुल मिलाकर, बिहार विधानसभा का यह फ्लोर टेस्ट सिर्फ बहुमत साबित करने की प्रक्रिया नहीं रहा, बल्कि यह सियासी ताकत, बयानबाजी और आने वाले राजनीतिक समीकरणों का संकेत भी बन गया है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि सम्राट चौधरी की सरकार अपने वादों को किस तरह जमीन पर उतारती है और विपक्ष किस रणनीति के साथ सरकार को चुनौती देता है।



