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तंबाकू बना गरीबी का जाल

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भारत में तंबाकू का बढ़ता उपयोग केवल स्वास्थ्य के लिए ही नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और करोड़ों परिवारों की वित्तीय स्थिति के लिए भी गंभीर खतरा बनता जा रहा है। हाल ही में प्रतिष्ठित जर्नल BMJ Global Health में प्रकाशित एक अध्ययन ने इस समस्या की गहराई को उजागर करते हुए बताया है कि तंबाकू पर होने वाला खर्च गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों को “गरीबी के जाल” में फंसा रहा है। अध्ययन के अनुसार, अगर लोग तंबाकू का सेवन छोड़ दें तो भारत के 2 करोड़ (20 मिलियन) से अधिक परिवारों की आर्थिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हो सकता है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि तंबाकू पर खर्च होने वाला पैसा सीधे तौर पर परिवारों की बुनियादी जरूरतों—जैसे भोजन, शिक्षा और स्वास्थ्य—से कट जाता है। इसका असर खासकर ग्रामीण और गरीब तबके पर ज्यादा देखने को मिलता है, जहां आय सीमित होती है और स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च पहले ही अधिक होता है।

अध्ययन में यह भी सामने आया है कि तंबाकू से जुड़ी बीमारियों के इलाज और कामकाजी क्षमता में कमी के कारण वैश्विक स्तर पर हर साल 1 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा का आर्थिक नुकसान होता है। भारत जैसे विकासशील देशों में यह असर और भी ज्यादा गंभीर है, क्योंकि यहां बड़ी आबादी अपनी आय का बड़ा हिस्सा तंबाकू पर खर्च करती है, जिससे गरीबी का चक्र और मजबूत हो जाता है।

शोधकर्ताओं ने 2022-23 के राष्ट्रीय नमूना सर्वे (NSS) के आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए पाया कि अगर तंबाकू पर होने वाला खर्च बचाया जाए तो परिवारों की वास्तविक आय और उपभोग क्षमता बढ़ सकती है। इससे लाखों परिवार गरीबी रेखा से ऊपर आ सकते हैं और उनकी जीवन गुणवत्ता में सुधार हो सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि तंबाकू केवल एक स्वास्थ्य समस्या नहीं बल्कि एक आर्थिक और सामाजिक चुनौती भी है। गरीब तबके में तंबाकू का सेवन ज्यादा होने के कारण यह वर्ग दोहरे नुकसान का सामना करता है—एक तरफ स्वास्थ्य पर असर और दूसरी तरफ आर्थिक बोझ। यही कारण है कि इसे “poverty trap” यानी गरीबी का जाल कहा जा रहा है।

नीतिगत स्तर पर भी यह मुद्दा महत्वपूर्ण बन गया है। विशेषज्ञ सुझाव दे रहे हैं कि तंबाकू पर उच्च कर, जागरूकता अभियान और सख्त नियंत्रण नीतियां अपनाकर न केवल स्वास्थ्य सुधार किया जा सकता है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी मजबूत किया जा सकता है। कुछ अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि तंबाकू पर कर बढ़ाने से खपत कम होती है और सरकार को अतिरिक्त राजस्व भी मिलता है, जो विकास कार्यों में लगाया जा सकता है।

कुल मिलाकर, यह अध्ययन साफ संकेत देता है कि तंबाकू की लत केवल व्यक्तिगत आदत नहीं, बल्कि एक व्यापक आर्थिक समस्या है, जिसका असर देश की गरीबी, विकास और सामाजिक संरचना पर पड़ रहा है। अगर इस पर समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो यह समस्या और गहराती जाएगी।

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