Advertisement
उत्तर प्रदेशलाइव अपडेट
Trending

कांशीराम की विरासत पर सियासत तेज

Advertisement
Advertisement

उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों बहुजन आंदोलन के प्रमुख नेता और बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम की विरासत को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। उनके जन्मदिन के अवसर पर लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दल खुद को उनके विचारों का असली वारिस बताने की कोशिश कर रहे हैं। दरअसल कांशीराम को उत्तर भारत में दलित राजनीति का बड़ा चेहरा माना जाता है, जिन्होंने बहुजन समाज को राजनीतिक रूप से संगठित करने के लिए लंबे समय तक संघर्ष किया और इसी मिशन के तहत 1984 में बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की। उनके नेतृत्व में दलित, पिछड़े और वंचित वर्गों की राजनीति को नई दिशा मिली और बाद में मायावती को उन्होंने अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाया।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में करीब 20 प्रतिशत मतदाता दलित समुदाय से आते हैं और राज्य की लगभग 120 से ज्यादा विधानसभा सीटों पर उनका प्रभाव निर्णायक माना जाता है। यही कारण है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सभी दल दलित वोटों को अपने पक्ष में करने के लिए कांशीराम के विचारों और उनके संघर्ष को सामने रख रहे हैं। उनके जन्मदिन के मौके पर अलग-अलग पार्टियों द्वारा बड़े कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, जिनके जरिए दलित समाज तक पहुंचने की कोशिश की जा रही है।

बहुजन समाज पार्टी, जो कांशीराम की स्थापित पार्टी है, उनके नाम पर बड़े स्तर पर कार्यक्रम आयोजित कर अपने पारंपरिक वोट बैंक को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। पार्टी ने कार्यकर्ताओं को लखनऊ में जुटने का आह्वान भी किया है ताकि यह दिखाया जा सके कि कांशीराम की असली राजनीतिक विरासत अभी भी BSP के पास ही है। वहीं दूसरी ओर समाजवादी पार्टी ने उनके जन्मदिन को “PDA दिवस” के रूप में मनाने का फैसला किया है, जिसमें पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समुदायों को एक मंच पर लाने की रणनीति अपनाई जा रही है।

कांग्रेस भी दलित राजनीति में अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए कांशीराम की विचारधारा का सहारा ले रही है। पार्टी नेता राहुल गांधी सामाजिक न्याय, जाति जनगणना और प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों को उठाते हुए कांशीराम के आंदोलन को याद कर रहे हैं और उन्हें भारत रत्न देने की मांग भी कर चुके हैं। इस पहल को कांग्रेस की उस रणनीति के रूप में देखा जा रहा है जिसके जरिए वह उत्तर प्रदेश में अपने पुराने दलित समर्थन आधार को फिर से मजबूत करना चाहती है।

हालांकि इस मुद्दे पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी तेज हो गए हैं। BSP प्रमुख मायावती और अन्य नेताओं का कहना है कि कई दल केवल चुनावी फायदे के लिए कांशीराम की विरासत का इस्तेमाल कर रहे हैं, जबकि कुछ नेता दावा करते हैं कि उनका आंदोलन किसी एक पार्टी तक सीमित नहीं था बल्कि बहुजन समाज के व्यापक अधिकारों की लड़ाई का प्रतीक था। यही वजह है कि आज कांशीराम की विरासत को लेकर सवाल उठ रहा है—“किसके कांशीराम?”—और यह बहस आने वाले चुनावों तक और तेज होने की संभावना है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
YouTube
LinkedIn
Share