
BRICS शिखर सम्मेलन के बहाने शी जिनपिंग का संभावित भारत दौरा, रिश्तों में सुधार के संकेत
भारत और चीन के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव के बीच एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक बदलाव के संकेत मिल रहे हैं। खबर है कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग वर्ष 2026 में भारत दौरे पर आ सकते हैं, जहां वे BRICS शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। अगर यह दौरा होता है, तो यह जून 2020 की गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद उनका पहला भारत दौरा होगा, जिसे दोनों देशों के संबंधों में एक बड़े मोड़ के रूप में देखा जा रहा है।
दरअसल, भारत इस साल BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है और इसी के तहत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले ही शी जिनपिंग को भारत आने का औपचारिक निमंत्रण दिया था। चीन ने इस निमंत्रण को सकारात्मक रूप से लिया है और भारत की BRICS अध्यक्षता का समर्थन भी जताया है। इससे साफ संकेत मिलता है कि दोनों देश बहुपक्षीय मंचों के जरिए अपने संबंधों को सुधारने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
हाल के महीनों में भारत और चीन के बीच कूटनीतिक गतिविधियों में तेजी भी देखी गई है। दोनों देशों के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच लगातार बातचीत हो रही है और क्षेत्रीय व वैश्विक मुद्दों पर सहयोग बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। चीन के विशेष दूत और विदेश मंत्री स्तर के दौरे की संभावनाएं भी इसी कड़ी का हिस्सा मानी जा रही हैं, जो शीर्ष नेताओं की मुलाकात का रास्ता तैयार कर सकती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि BRICS जैसे मंच दोनों देशों को एक “न्यूट्रल स्पेस” प्रदान करते हैं, जहां वे अपने द्विपक्षीय विवादों को अलग रखते हुए साझा हितों पर काम कर सकते हैं। यही कारण है कि सीमा पर तनाव के बावजूद दोनों देश इस मंच के जरिए संवाद बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। भारत भी स्पष्ट कर चुका है कि वह क्षेत्रीय तनाव कम करने और स्थिरता बनाए रखने के लिए चीन सहित BRICS देशों के साथ मिलकर काम करने को तैयार है।
हालांकि, यह भी सच है कि भारत-चीन संबंध अभी पूरी तरह सामान्य नहीं हुए हैं। वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है और कई मुद्दे अब भी लंबित हैं। ऐसे में शी जिनपिंग का संभावित भारत दौरा केवल एक कूटनीतिक पहल नहीं, बल्कि दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।
कुल मिलाकर, BRICS शिखर सम्मेलन 2026 केवल एक अंतरराष्ट्रीय आयोजन नहीं बल्कि भारत और चीन के बीच रिश्तों की नई शुरुआत का मंच बन सकता है। यदि यह दौरा होता है, तो यह न केवल एशिया बल्कि वैश्विक राजनीति में भी एक महत्वपूर्ण संदेश देगा कि प्रतिस्पर्धा के बावजूद सहयोग की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है।



