
अमेरिका द्वारा रूस और ईरान से तेल खरीद पर दी जा रही अस्थायी छूट (sanctions waiver) समाप्त करने के फैसले ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में हलचल तेज कर दी है। इस फैसले का सीधा असर भारत जैसे देशों पर पड़ने वाला है, जो पिछले कुछ समय से रियायती दरों पर रूसी तेल खरीदकर अपनी ऊर्जा जरूरतें पूरी कर रहे थे। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने स्पष्ट कर दिया है कि अब इन छूटों को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा, जिससे रूस और ईरान से तेल आयात पर फिर से सख्त प्रतिबंध लागू हो जाएंगे।
दरअसल, यूक्रेन युद्ध और पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद रूस सस्ते दामों पर तेल बेच रहा था, जिसका भारत ने बड़े पैमाने पर फायदा उठाया। आंकड़ों के मुताबिक, मार्च 2026 में भारत के कुल तेल आयात का लगभग 44% हिस्सा रूस से आया था, जो यह दिखाता है कि भारत की निर्भरता काफी बढ़ चुकी थी। लेकिन अब अमेरिकी फैसले के बाद इस आपूर्ति में गिरावट आ सकती है और भारत को नए स्रोत तलाशने पड़ सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अब मध्य-पूर्व (West Asia), अमेरिका, अफ्रीका और अन्य देशों की ओर रुख कर सकता है, हालांकि वहां से मिलने वाला तेल अपेक्षाकृत महंगा हो सकता है। इसके अलावा, होर्मुज जलडमरूमध्य में जारी तनाव और वैश्विक भू-राजनीतिक हालात ने पहले ही सप्लाई चेन को प्रभावित कर रखा है, जिससे तेल की कीमतों पर दबाव बना हुआ है।
हालांकि भारत ने संकेत दिए हैं कि वह पूरी तरह से रूस से तेल खरीद बंद नहीं करेगा और वैकल्पिक रास्तों से आयात जारी रखने की कोशिश करेगा। सरकार का मानना है कि देश ने अपनी तेल सप्लाई को विविध (diversified) बना रखा है और वह 40 से ज्यादा देशों से कच्चा तेल खरीदता है, इसलिए तत्काल कोई बड़ा संकट नहीं आएगा।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा असर आम लोगों पर पड़ सकता है, क्योंकि अगर सस्ता तेल मिलना बंद हुआ तो पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है। साथ ही, भारत के व्यापार घाटे और महंगाई पर भी इसका असर देखने को मिल सकता है।
कुल मिलाकर, अमेरिका के इस फैसले ने भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा की चुनौती को और बढ़ा दिया है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत किस तरह से अपने तेल आयात के स्रोतों में बदलाव करता है और बढ़ती कीमतों के दबाव को संभालता है।



